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 माता ब्रहमचारिणी मां दुर्गा को द्वितीय शक्ति स्वरूप है। मां स्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बांए हाथ में कमण्डल लिए हुए सुशोभित है

 Navratri-Mata Brahmcharini Poojan vidhi tatha mahtv

नवरात्री - माता ब्रह्मचारिणी पूजन विधि तथा महत्व - Navratri-Mata Brahmcharini Poojan vidhi tatha mahtv

शास्त्रों के अनुसार यह राजा हिमालय की पुत्री है तथा नादर के उपदेश के बाद यह भगवान को अपने पति के रूप में पाने के लिए इन्होंने कठोर तप किया इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 1000 वर्षों तक फल खाकर ही रहीं तथा ब्रहमचारिणी मां दुर्गा को द्वितीय शक्ति स्वरूप है। मां स्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बांए हाथ में कमण्डल लिए हुए सुशोभित है। पैराणिक ग्रंथों के अनुसार यह हिमालय की पुत्री  है नादर के उपदेश के बाद यह भगवान शिव को  पति के रूप में पाने के लिए इन्होंने कठोर तप किया। जिस कारण इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए 1000 वर्षों तक सिर्फ फल खाकर ही रहीं तथा अगले 3000 वर्षों तक सूखे बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती इनकी कठिन तपस्या के बाद यह भगवान शिव को अपने पति रूप में पा सकी

पूजन विधि 

सर्वप्रथम माता ब्रह्मचारिणी को दूध, दही, शर्करा, घी मधु से स्नान करायें व देवी को प्रसाद अर्पित करें देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा  फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से  करें तथा प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें देवी को अरूहूल का फूल व कमल बेहद प्रिय होते हैं अत: इन फूलों की माला पहनायें, घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें.  

ध्यान मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।   

 दधांना कर पहाभ्यामक्षमाला कमण्डलम।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मiचारिण्यनुत्तमा।।

ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ  

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥
ब्रह्मचारिणी की कवच :
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

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