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 भात नोतने  के गीत - bhaat notne ke geet

भात नोतने  के गीत - bhaat notne ke geet


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सेरक सतुआ पांच सुपारिया ता ऊपर गुड़ की डेली 
के सतुअन बहुत संकोच करी...... 

सावन न आई सनूने न आई 
तौ जेठ में उठकि चली 
के सतुअन बहुत संकोच करी...... 

भात नोतने चली है चमेली 
भतयन भीर रे पड़ी 
के सतुअन बहुत संकोच करी...... 

तेरे भतीजे पै कुरता न टोपी 
दुपट्टा देंजा लली 
के सतुअन बहुत संकोच करी.....

गांव का जमींदार यो उठ बोला 
मेरी सुन जा लली 
के सतुअन बहुत संकोच करी.....


तेरे बिरन पर टोटा आयो   
तो बाको में रहजा लली
के सतुअन बहुत संकोच करी..... 

नदिया के पार पर सतुआ खाये 
दुःख सुःख भूल गयी 
के सतुअन बहुत संकोच करी.....

इत तेउ अरकटा बिततेउ झरकटा 
तो बिच में घेर लई 
के सतुअन बहुत संकोच करी.....

छोटो  देवर यों उठ बोल्यो 
क्या भावी लेके चली 
ना कुछ लायी ना कुछ ले लई 
मंदी में चोट पड़ी 
के सतुअन बहुत संकोच करी.....

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