Anant chaturdashi Vrat Puja Vidhi & Vrat Katha - अनंत चतुर्दशी व्रत कथा एवम पूजा विधि

भाद्रपद महीने (Bhadon Month) की शुक्‍ल पक्ष (Shukla Paksh) की चतुर्दशी तिथि को (Chaturdasi Tithi) अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) कहते हैं, अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) या अनंत चौदस हिंदू धर्म और जैन धर्म (Jainism) दोनों के लिये पविञ त्‍यौहार है,इस दिन भगवान अनंत की पूजा की जाती हैै, ऐसी मान्‍यता है कि भगवान अनंत (Bhagwan Anant), भगवान सत्‍यनारायण (Bhagwan Satyanarayan) यानि भगवान विष्‍णु का ही एक रूप हैं

 

Anant chaturdashi Vrat Puja Vidhi & Vrat Katha - अनंत चतुर्दशी व्रत कथा एवम पूजा विधि

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अनंत चतुर्दशी व्रत पूजा विधि - Anant chaturdashi Vrat  Puja Vidhi

अनंत चतुर्दशी व्रत में सूत या रेशम के धागे को लाल कुंकुम से रंगकर उसमें चौदह गांठे लगाकर  अनंत बनाया जाता है । इस अनंत रूपी धागे को पूजा में भगवान पर चढ़ा कर व्रती अपने बाजु में बाँधते हैं । पुरुष दाएं तथा स्त्रियां बाएं हाथ में अनंत बाँधती है अनंत डोरा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देने वाला माना गया है।यह व्रत धन पुत्रादि की कामना से किया जाता है। इस दिन नए डोरे के अनंत को धारण करके पुराने का विसर्जन किया जाता है इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके कलश की स्थापना की जाती है जिसपर कमल का फूल और कुशा का सूत्र चढ़ाया जाता है और कलश की पूजा अर्चना हल्दी कुमकुम से की जाती है इस दिन भोजन में नमक नहीं खाया जाता इसलिये भोजन में खीर पूरी का भोग भगवान् को लगाकर भोजन किया जाता है और  अनंत डोरा बांधा  जाता है इसलिये कई स्‍थानोंं पर दिन सत्‍यनारायण कथा (Satyanarayan Katha) का अायोजन भी किया जाता है। इस दिन भगवान अनंत देव की पूजा के समय उनको अनंत सू्ञ (Anant sutra) चढाया जाता है


अनंत चतुर्दशी व्रत कथा - Anant chaturdashi  Vrat Katha

प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई।पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए। कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे।सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई।कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। उन्होंने डोरे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया, इससे भगवान अनंत जी का अपमान हुआ। परिणामत: ऋषि कौंडिन्य दुखी रहने लगे। सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं।पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े। तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले- ‘हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा। तुम दुखी हुए। अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्षपर्यंत व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।

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